अफ़सोस कि फ़िरऔन को कॉलेज की न सूझी

ये एक अटल हक़ीक़त है कि इंसानी ज़हनों को ग़ुलाम बनाने के लिए तालीम एक असरदार हथियार है हम अपनी आँखों से देख रहे हैं कि इंसानी जिस्मों पर ब्रिटिश राज के ख़त्म होने के बावजूद उनकी भाषा, उनकी संस्कृति और उनकी सोच सर चढ़कर बोल रही है। किसी देश की राष्ट्रीय शिक्षा नीति उस देश का भविष्य तय करती है।आज़ादी के बाद देश की जो राष्ट्रीय शिक्षा नीति (National Educational Policy) बनाई गई उसमें नागरिकों की भाषा, संस्कृति, पहचान और धर्म का ख़ास ख़याल रखा गया। एक लम्बे समय तक इसी स्प्रिट के साथ एजुकेशन सिस्टम चलता रहा। सरकार की सरपरस्ती में नई नस्लें शिक्षा पाती रहीं और देश की सेवा करती रहीं। जिन लोगों को सरकार…
नई शिक्षा नीति में जिस पैमाने पर पॉलिसी में बदलाव किये गए हैं और जिस बड़े पैमाने पर लोगों की और रिसोर्सेज़ की ज़रूरत पड़ेगी वो कहाँ से आएँगे?हालाँकि सरकार ने GDP का 6% ख़र्च करने की बात कही है, लेकिन जहाँ 3% रक़म भी मयस्सर न हो वहाँ 6% कहाँ से आएँगे?

 

नए सिस्टम में पहली क्लास से पहले भी तीन क्लासें होंगी, स्पेशल सब्जेक्ट्स की क्लासेज़ होंगी, मातृ भाषा और क्षेत्रीय भाषा के टीचर्स भी चाहिये होंगे, वोकेशनल एजुकेशन भी छटी क्लास से दी जाएगी, इन सबके लिये स्कूल की बिल्डिंग, टीचर्स और एक्सपर्ट्स की ज़रूरत होगी और जिस देश में टीचर्स की एक तिहाई सीटें पहले से ही ख़ाली हों, कई स्टेट्स में टीचर्स को तनख़ाहें देने के लाले पड़ रहे हों, वहाँ नई भर्ती के लिये रक़म कहाँ से आएगी?
नई शिक्षा नीति मदरसा एजुकेशन पर बिलकुल ख़ामोश है। जबकि देश की शिक्षा तथा साक्षरता में मदरसों का अहम् रोल रहा है। ख़ुद सरकारी बोर्डों के तहत हज़ारों मदरसे चल रहे हैं। इसके बावजूद मदरसों के बारे में पॉलिसी के अन्दर कोई ज़िक्र न करना अजीब मालूम होता है। जबकि पॉलिसी के ड्राफ्ट में मदरसा एजुकेशन का ज़िक्र था। इसका एक मतलब तो यह है कि मदरसे ज्यों का त्यों अपना सिस्टम चलाने में आज़ाद होंगे।

 

या फिर मदरसों को देश के एजुकेशन सिस्टम का हिस्सा तस्लीम नहीं किया जाएगा। इसी तरह छः अंतरराष्ट्रीय भाषाओं (संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रमाणित अंतरराष्ट्रीय भाषाएँ) में से दो भाषाओं अरबी और चाइनीज़ को छोड़ दिया गया है। जबकि आधी दुनिया ये दोनों भाषाएँ बोलती है। यह रवैया संकीर्ण मानसिकता की पहचान है। विश्व-गुरु की पोज़िशन हासिल करनी है तो दिल बड़ा करना होगा। पूरी पॉलिसी में प्राचीन सभ्यता का बार-बार ज़िक्र किया गया है। इससे ख़तरा यह है कि कहीं एक हज़ार साल से चले आ रहे इतिहास को सिलेबस से बहार न कर दिया जाए।
हर बार की तरह नई शिक्षा नीति में भी यह बात दोहराई गई है कि प्राइमरी एजुकेशन मातृ भाषा या क्षेत्रीय भाषा में दी जाएगी। बल्कि इस बार इसको जूनियर तक करने का ज़िक्र किया गया है। लेकिन हम देखते हैं कि हिन्दी-भाषी राज्यों में इसकी कोई व्यवस्था नहीं की जाती।

 

उत्तर प्रदेश जहाँ उर्दू बोलने वालों की संख्या 19% है और पाँच करोड़ लोगों की मातृ-भाषा उर्दू है, उर्दू को दूसरी सरकारी भाषा का दर्जा हासिल है। वहाँ एक भी उर्दू मीडियम स्कूल नहीं है। मातृ भाषा के साथ क्षेत्रीय भाषा कहकर भी शंकाएँ पैदा की गई हैं। पॉलिसी के अन्दर हिन्दुस्तानी भाषाओं की लिस्ट में उर्दू का ज़िक्र तक नहीं किया गया है। जबकि उर्दू कई राज्यों की दूसरी भाषा है। लिट्रेचर का बड़ा सरमाया उर्दू में मौजूद है। उर्दू के 400 से ज़्यादा अख़बार प्रकाशित होते हैं, उर्दू के बग़ैर भारत की सांस्कृतिक परम्पराएँ जैसे बॉलीवुड, संगीत वग़ैरह अधूरी हैं। उर्दू भाषा के लिये यह बड़े ख़तरे की घंटी है।
नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति बन गई है अब एक्शन-प्लान बनेगा, एक्शन प्लान का समय भी तय कर दिया गया है, पूरी पॉलिसी कई चरणों में लागू होगी और 2040 तक पूरी होगी। मेरी सरकारों से अपील है कि वो भारत की लोकतान्त्रिक स्प्रिट को बाक़ी रखते हुए एक्शन-प्लान बनाएँ। शिक्षा के मैदान में असमानता को ख़त्म करें। पॉलिसी लागू करने के लिये जो मिशन, बोर्ड और आयोग बनाए जाएँ उनमें मुसलमानों को नुमाइन्दगी दी जाए।

जहाँ स्कूल कम हैं स्कूल बनाए जाएँ। टीचर्स की ख़ाली जगहों को भरा जाए। मदरसों के ज़िम्मेदार लोग भी वक़्त के तक़ाज़ों को समझें, आधुनिक विषयों को अपने सिलेबस में शामिल करें, मदरसा एजुकेशन सिस्टम को इस तरह अपग्रेड करें जिससे देश को एक और एजुकेशन सिस्टम मिल जाए। मेरी एजुकेशनल एक्सपर्ट्स, ख़ास तौर से मुसलमान आलिमों और दानिशवरों (बुद्धिजीवी वर्ग) से गुज़ारिश है कि वो पालिसी का गहराई से अध्ययन करें, तवज्जोह के क़ाबिल बातों की निशानदेही करके सम्बन्धित सरकारों को आगाह करें, एक्शन-प्लान के बनने में अपना रोल अदा करें। जिन क़ौमों के लीडर्स ये काम करेंगे उन क़ौमों को उनका हिस्सा भी मिल जाएगा और उनकी चिंताएं भी दूर कर दी जाएँगीं और जो ख़्वाबगाहों (बन्द कमरों) में रह जाएँगे वो ख़्वाब देखते रह जाएँगे।

यूँ क़त्ल से बच्चों के वो बदनाम न होता।
अफ़सोस कि फ़िरऔन को कॉलेज की न सूझी॥

*कलीमुल हफ़ीज़*, नई दिल्ली

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