मेरी ख़िदमात भी जफ़ा ठहरीं, कैसे दिन आ गए मुहब्बत में

सुदर्शन न्यूज़ का जवाब UPSC में कामयाब होकर मुल्क की ख़िदमत करना है

सुदर्शन का मक़सद तो यह था कि इस प्रोग्राम के ज़रिए मुसलमानों से नफ़रत में बढ़ोतरी होगी। साम्प्रदायिक ताक़तों को बल मिलेगा। चैनल की टी आर पी बढ़ेगी। सिविल सर्विसेज़ में मौजूद मुसलमान अफ़सरों को शक की निगाहों से देखा जाने लगेगा। इन पर देश के साथ ग़द्दारी करने के मुक़द्दिमे क़ायम करने में आसानी होगी। हिन्दुओं में इन्तिक़ाम के शोले भड़केंगे। इस तरह देश का सदियों पुराना भाई चारा और साम्प्रदायिक सौहार्द्र बिखर कर रह जाएगा। मुसलमान जो पहले ही मॉब-लिंचिंग, NRC, बाबरी मस्जिद, कश्मीर के विभाजन, तलाक़-बिल आदि के बाद मायूसी और पस्तहिम्मती के दलदल में चला गया है। इस प्रोग्राम को पेश करने के बाद और टूट जाएगा। लेकिन सुदर्शन न्यूज़ को यह मालूम नहीं था कि अभी जज साहिबान का ज़मीर ज़िन्दा है। बहुत कम या कभी-कभार ही सही अदालतों में ज़मीर और क़ानून को सामने रखकर भी फ़ैसले सुना दिये जाते हैं। हमारे देश के लोकतन्त्र की यही कुछ-एक साँसें बाक़ी हैं।

अदालत की फिटकार के बाद ये मामला मुसलमानों के लिये चिन्ता का विषय बन गया। मालूम होना चाहिये कि यूपीएससी में हर साल दस से बारह लाख लोग Preliminary इम्तिहान के लिये फ़ॉर्म भरते हैं। इनमें मुसलमान लगभग पाँच हज़ार होते हैं जो अपनी आबादी के अनुपात से बहुत ही कम हैं। अगर आबादी के अनुपात से देखा जाए तो यह संख्या डेढ़ लाख के आसपास होनी चाहिये। Main Exam के लिये क्वालीफाई करने वाले लगभग बारह हज़ार स्टूडेंट्स होते हैं। इनमें मुसलमानों का अनुपात और भी कम हो जाता है। अन्तिम चरण यानी इंटरव्यू के लिये क्वालीफाई करने वाले लगभग ढाई हज़ार लोगों में से पिछले साल केवल 288 मुसलमान थे और फ़ाइनल चुने जाने वाले 829 में से केवल 42 मुसलमान ही चुने गए। 42 की यह संख्या अनुपात में केवल पाँच परसेंट है। जबकि आबादी पन्दरह परसेंट है। मगर यह संख्या भी साम्प्रदायिक लोगों को गवारा नहीं है।

सुदर्शन न्यूज़ के प्रोग्राम ने पूरी दुनिया को भारतीय मुसलमानों की सिविल सर्विसेज़ सेवाओं में अनुपात का जायज़ा लेने पर आमादा कर दिया है। दुनिया भर के इन्साफ़-पसन्दों ने सुदर्शन की इस ओछी हरकत की भर्त्सना की है। मुसलमानों की शिक्षा का अनुपात, सिविल सर्विसेज़ में आने और चुने जाने पर चिन्ता जताई है। इस चिन्ता ने फ़िक्र और अमल पर आमादा किया और सिविल सर्विसेज़ की कोचिंग कराने वाले माइनॉरिटी संस्थाओं की एक फ़ेडरेशन “दी फ़ेडरेशन ऑफ़ सिविल सर्विसेज़ कोचिंग सेंटर्स” का जन्म हो गया। इस फ़ेडरेशन के ज़िम्मेदारों ने सबसे पहला टारगेट यह रखा है कि सिविल सर्विसेज़ में मुसलमानों के शामिल होने की तादाद को पाँच हज़ार से बढ़ाकर पचास हज़ार किया जाएगा। यह टारगेट कोई मुश्किल नहीं है। जिस देश में दस हज़ार से अधिक मुस्लिम सीनियर सेकंड्री स्कूल हों। एक हज़ार के लगभग मुस्लिम डिग्री कॉलेज हों, जहाँ एक दर्जन से अधिक मुस्लिम मैनेज्ड यूनिवर्सिटियाँ हों, जहाँ लाखों स्टूडेंट्स ग्रेजुएशन कर रहे हों, उस देश में यूपीएससी के Exam के लिये पचास हज़ार स्टूडेंट्स का फ़ॉर्म भरने पर आमादा हो जाना कोई मुश्किल टारगेट नहीं हैं। फ़ेडेरेशन ने तय किया है कि एक यूनाइटेड पोर्टल बनाया जाएगा। इस टारगेट को हासिल करने के लिये जागरूकता अभियान चलाएगा। कॉन्फ़्रेंसें होंगी, पब्लिक ऐड दिये जाएँगे, ज़रूरत के अनुसार नए कोचिंग सेंटर्स क़ायम किये जाएँगे। तमाम कोचिंग सेंटर्स आपस में तज्रिबों, रिसोर्सेज़ और इश्यूज़ शेयर करेंगे। अल्लाह करे कि यह फ़ेडरेशन अपनी प्लानिंग और टारगेट को हासिल करने में कामयाब हो।

इस मौक़े पर मैं मुस्लिम स्टूडेंट्स से यह बात कहना चाहूँगा कि वो सिविल सर्विसेज़ को अपना टारगेट बनाएँ। जो बच्चे इस तरफ़ जाना चाहते हैं वो कक्षा 9 से ही इसकी तैयारी शुरू कर दें। इसके लिये हमारे स्कूलों और कॉलेजों के प्रिंसिपल्स और ज़िम्मेदारों को तवज्जोह देनी होगी। उन्हें इसके लिये बच्चों की कॉउंसलिंग करना होगी। अगर हर स्कूल और कॉलेज केवल दस स्टूडेंट्स पर तवज्जोह दे तो डेढ़ लाख का टारगेट भी हासिल किया जा सकता है। ख़याल रहे कि ये इम्तिहान बहुत संजीदगी और गम्भीरता से होता है। इसलिये स्टूडेंट्स और माँ-बाप भावनाओं में बहकर फ़ैसला न करें। यह इम्तिहान मुश्किल ज़रूर है लेकिन इसको पास करने वाले इन्सान ही होते हैं। जी तोड़ मेहनत करें, ऐसे कोचिंग सेंटर्स को चुनें जहाँ इस के एक्सपर्ट्स हों। आप लोगों का वक़्त भी क़ीमती है और पैसा भी। इसलिये बहुत सोच-समझ कर फ़ैसला करें। एक बार जब फ़ैसला करें तो अपने फ़ैसले को सही साबित करने के लिये जिद्दोजुहद करें। सुदर्शन की शरारत का जवाब झुंझलाना, मायूस होना, शोर मचाना या बातें बनाना नहीं, बल्कि यूपीएससी में ज़्यादा से ज़्यादा कामयाब होकर मुल्क की ख़िदमत करना है।

मेरी ख़िदमात भी जफ़ा ठहरीं।

कैसे दिन आ गए मुहब्बत में॥

कलीमुल हफ़ीज़, नई दिल्ली

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