अब जबकि ट्रम्प हार गए हैं तो ज़रूर दुनिया के अमन-पसन्दों ने राहत की साँसें ली होंगी।

उम्मीद है कि दुनिया में अमन का सूरज निकला होगा। माइनॉरिटी पर ज़ुल्म कम होंगे। ये मेरे ही नहीं ख़ुद अमरीकियों के अहसासात हैं। इसलिये कि उनके राष्ट्रपति काल में अमरीकियों ने पाया कम और खोया ज़्यादा है। ट्रम्प के बे-दलील रवैये की वजह अमरीका के सम्मान में कमी आई है। जोज़फ़ बाइडन के पहले भाषण से भी उम्मीद की किरणें फूट रही हैं। उम्मीद है कि वो नस्ल-परस्ती को ख़त्म करेंगे और जोड़ने का काम करेंगे, ट्रम्प की तस्वीर एक घमंडी व्यक्ति की थी, उनका नारा था जो हमारे साथ नहीं वो अमरीका का ग़द्दार है।

 

वे समझ रहे थे की उन्हें हराया नहीं जा सकता है, नतीजे आने से पहले ही ख़ुद को विजयी घोषित कर दिया था। हार होते देखते ही इलेक्शन में धाँधलियों के इल्ज़ामात लगाने लगे थे, यहाँ तक कि अदालत भी चले गए। वे यह भी भूल गए कि जिस सिस्टम को वो बेईमान बता रहे हैं वो उनके उसी देश का है जिसके वे चार साल से राष्ट्रपति हैं। हालाँकि इलेक्शन के दौरान उन्होंने वे तमाम काम भी किये जिनसे उनके विरोधियों को हार का मुँह देखना पड़े। मिसाल के तौर पर अमरीकी काले लोगों के लिये पोलिंग बूथ दूर बनाए गए, उनके पोलिंग बूथों पर देर से पोलिंग शुरू किया गया ताकि लम्बी-लम्बी लाइनें देखकर वोटर्स वापस हो जाएँ। इसके बावजूद ट्रम्प हार गए।

इसका मतलब है कि हार-जीत के फ़ैसले कहीं और होते हैं। अगर देश के वोटर्स जाग जाएँ, वो अपने हाकिमों की नीयत और नीति को समझ लें तो कोई ऐसी ताक़त ज़रूर है जो तमाम हथकण्डों के इस्तेमाल के बावजूद ग़ुरूर को ख़ाक में मिला सकती है, अमरीकी चुनावी नतीजों से उन देशों के नेताओं को ज़रूर सबक़ लेना चाहिये जो सरकार और सत्ता के घमंड में इतने मस्त हो जाते हैं कि उनसे अच्छे और बुरे में भेद करने की सलाहियत ही छीन ली जाती है। ट्रम्प की हार में उनके घमण्ड के साथ ही उनकीनासमझियाँ भी शामिल हैं, कोरोना के दौर में पत्रकारों के सवालों के जवाबों पर झुँझलाना उनकी आदत बन गई थी। एक बार तो प्रेस कॉन्फ़्रेंस छोड़कर ही चले गए थे। कोरोना की वजह से आर्थिक संकट से निपटने में भी ट्रम्प नाकाम साबित हुए।

 

क्लाइव लायड की मौत पर भी उनकी तुच्छ स्ट्रेटेजी और बे-तुके बयानात ने आग में घी का काम किया था। बे-जा ग़ुस्सा और हद से ज़्यादा झूट भी उनकी नाकामी की वजह बने। यानी हम कह सकते हैं कि ट्रम्प को उनके ग़ुरूर, ग़ुस्से, झूट, झुंझलाहट, मिज़ाज और स्वभाव में ठहराव की कमी और अन्याय पर आधारित पॉलिसी की वजह से हार का मुँह देखना पड़ा।

जो-बाइडन डेमोक्रेट हैं। बड़ी उम्र के हैं। एक सुलझे हुए राजनेता हैं। लेकिन हमें यह याद रखना चाहिये कि आदमी के बदलने से रातों-रात कोई बदलाव नहीं आ जाता। ख़ास तौर से मुस्लिम उम्मत को ये बात समझना चाहिये कि अमरीका में पॉलिसी बनाने वाली संस्थाओं पर यहूदियों का असर ज़्यादा है। यहूदी जो चाहते हैं फ़ैसला कराते हैं, इस्राईल को अमरीका के सभी राष्ट्रपतियों का समर्थन रहा है और रहेगा,

 

जो-बाइडन भी ‘अमरीका फ़र्स्ट’ की पॉलिसी पर अमल करते रहेंगे। हम जानते हैं कि बिल-क्लिंटन और बराक-ओबामा भी डेमोक्रेट थे। उनके ज़माने में भी मुस्लिम उम्मत पर बम्बारियाँ हुई हैं, कई देशों में जंगें हुईं। इस्लाम को नुक़सान पहुँचाया गया। इसलिये जो-बाइडन को फ़तह की मुबारकबाद देते वक़्त हमें ज़्यादा ख़ुश नहीं होना चाहिये। अलबत्ता अमरीका में ट्रम्प की हार और बिहार में उनके दोस्तों के नुक़सान से उम्मीद रखना चाहिये कि दुनिया भर में फासीवाद की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है।

कलीमुल हफ़ीज़, नई दिल्ली

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