मेरी ख़िदमात भी जफ़ा ठहरीं, कैसे दिन आ गए मुहब्बत में

सुदर्शन न्यूज़ का जवाब UPSC में कामयाब होकर मुल्क की ख़िदमत करना है सुदर्शन का मक़सद तो यह था कि इस प्रोग्राम के ज़रिए मुसलमानों से नफ़रत में बढ़ोतरी होगी। साम्प्रदायिक ताक़तों को बल मिलेगा। चैनल की टी आर पी बढ़ेगी। सिविल सर्विसेज़ में मौजूद मुसलमान अफ़सरों को शक की निगाहों से देखा जाने लगेगा। […]

एक हाथ में क़ुरआन हो एक हाथ में साइंस तेरे

वक़्त का तक़ाज़ा है कि मदरसों से पास-आउट मॉडर्न एजुकेशन और कॉलेज के पास-आउट दीनी तालीम हासिल करें)   इन्सान के लिये तालीम हासिल करने का अमल उसकी पैदाइश के साथ ही शुरू हो गया था। जब पैदा करने वाले ने पहले इन्सान को ख़ुद से कुछ नाम सिखाए थे और फ़रिश्तों से तालीमी मुक़ाबला […]

अफ़सोस कि फ़िरऔन को कॉलेज की न सूझी

ये एक अटल हक़ीक़त है कि इंसानी ज़हनों को ग़ुलाम बनाने के लिए तालीम एक असरदार हथियार है हम अपनी आँखों से देख रहे हैं कि इंसानी जिस्मों पर ब्रिटिश राज के ख़त्म होने के बावजूद उनकी भाषा, उनकी संस्कृति और उनकी सोच सर चढ़कर बोल रही है। किसी देश की राष्ट्रीय शिक्षा नीति उस […]

आज कल होता गया और दिन हवा होते गए

दुनिया में रोशनी की रफ़्तार बहुत तेज़ है। अंतरिक्ष में रोशनी की रफ़्तार 299,792,458 मीटर प्रति सेकंड है। लेकिन रोशनी की रफ़्तार से भी ज़्यादा तेज़ रफ़्तार वक़्त की है। वक़्त दबे पाँव चला जाता है। कल के बच्चे आज जवान हो गए और कल बूढ़े हो जाएँगे। न जाने कितने लोगों को काँधे पर […]

इन्सानियत की फ़लाह का जज़्बा रखते हुए क़दम से क़दम मिलाकर चलेंगे तो तब्दीली आएगी, इन्क़िलाब दस्तक देगा- कलीमुल हफ़ीज़

मेरे दोस्तों! बदलाव की बातें सब करते हैं। मस्जिद के इमाम से लेकर सियासत के इमाम तक भाषण देते हैं। मश्वरे देते हैं, लेकिन उससे एक क़दम आगे बढ़ने का काम नहीं करते और इसलिये क़ौम जहाँ थी वहीँ रह जाती है। सुननेवालों के दिलों में भी जज़्बात पनपते हैं, अज़्म और पक्के इरादे की […]

उठ बाँध कमर क्यों डरता है?

ज़मीन, सूरज और सितारों की गर्दिश से दिन-रात बदलते हैं। दिन-रात के बदलने से तारीख़ें बदलती हैं और तारीख़ें बदलने से महीने और साल बदलते हैं, यूँ साल पे साल गुज़र जाते हैं। वक़्त की रफ़्तार तेज़ होने के बावजूद सुनाई नहीं देती। बुज़ुर्ग कह गए कि वक़्त दबे पाँव निकल जाता है। कल के […]

*मन्दिर के संगे-बुनियाद से मुसलमानों को मायूस होने की नहीं बल्कि एहतिसाब (आत्म निरीक्षण) की ज़रूरत है।*

मुसलमानों का दूसरा जुर्म ये है कि उन्होंने देशवासियों को इस्लाम की दावत इस तरह नहीं दी जिस तरह देना चाहिये थी, बल्कि वो इस्लाम क़बूल करने के रास्ते में रुकावट बन गए। मुस्लिम बादशाहों ने सरहदों की हिफ़ाज़त और उसके फैलाव पर तो ख़ूब तवज्जोह दी लेकिन इस्लाम के प्रचार-प्रसार के लिये कोई ख़ास […]

लॉक-डाउन में ऑन-लाइन तालीम : इमकानात व मसायल

तालीम के चिराग़ जलाते हुए चलो   लॉक-डाउन में ज़िन्दगी के तमाम शोबे मुतास्सिर हुए हैं। लेकिन तालीम का शोबा सबसे ज़्यादा मुतास्सिर हुआ है और अभी दूर-दूर तक स्कूल खोलने के इशारे तक नहीं मिल रहे हैं। तालीम से वाबस्ता करोड़ों लोग बेरोज़गार हो गए हैं। बच्चे सबक़ भूल रहे हैं। कहते हैं कि […]

परिंदे हाथियों को हरा सकते हैं, मायूस न हो, इरादे न बदल तक़दीर

हम हिन्दुस्तानियों के लिये ये गर्व की बात है कि यहाँ श्री राम की जन्म भूमि है। हिन्दुस्तानी मुसलमान श्री राम से ज़र्रा बराबर नफ़रत नहीं करते बल्कि उनका सम्मान करते हैं। उनकी शान में गुस्ताख़ाना अलफ़ाज़ तक कहने से इस्लाम ने उन्हें रोका है।* इसके बावजूद मन्दिर की आधारशिला के फ़ंकशन को जिस अन्दाज़ […]

बराहीमी नज़र पैदा मगर मुश्किल से होती है

अरबी महीना ज़िल-हज्ज का चाँद नज़र आते ही मुस्लिम समाज में हज और क़ुर्बानी की चर्चा शुरू हो जाती है, जो लोग हज की सआदत (सौभाग्य) पा चुके हैं उनकी नज़रों में सारे दृश्य घूमने लगते हैं। क़ुर्बानी के जानवरों के बाज़ार सजने लगते हैं, गली-कूचों से बकरों की मैं-मैं की आवाज़ें कानों में रस […]

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